सारांश
इक्कीसवीं सदी में कोई एक भूदेश या गुट में सैद्धांतिक संघर्ष नहीं रह गया है-, बल्कि उसका प्रभाव अन्य देश में विभिन्न क्षेत्र जैसे ऊर्जा, व्यापार, वित्त, खाद्य सुरक्षा, रोजगार, आवास, सामाजिक स्थिरता, शांति आदि तक व्यापक रूप से फैलता और दिखता है। 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए इजरायल, अमेरिकाईरान युद्ध और इसके परिणामस्वरूप लाल सागर-, होर्मुज जलडमरूमध्य में उपनिबंधन ने इसपर परिवर्तनीय वैश्विक आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया। होर्मुज जलडमरूमध्य विशेष रूप से दक्षिणपूर्व एशिया की दिशा के- ऊर्जा या पार का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है और इसके उपनिबंधन ने तेल, गैस, उर्वरक तथा समुद्री परिवहन लागत को बहुत अधिक बढ़़ा दिया है। विश्व बैंक के अनुसार 2026 के इस संघर्ष के कारण वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर गंभीर दबाव पड़ा है तथा ऊर्जा कीमतों, मुद्रास्फीति और वित्तीय लागत में वृद्धि के कारण हालात खराब कर दिया हैं। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले विकासशील और ऊर्जा-आयात निर्भर देश के लिए इस संघर्ष का प्रभाव पेट्रोलियम, एलपीजी, प्राकृतिक गैस, परिवहन, विनिर्माण, कृषि और घरेलू उपयोग तक पहुंचता है। दूसरी ओर, दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देश भी मध्य पूर्व से तेल और गैस पर प्रायः निर्भर हैं। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी- IEA के अनुसार संकट से पहले दक्षिण पूर्व एशिया के लगभग-60 प्रतिशत कच्चे तेल आयात और लगभग एक तिहाई गैस का आयात खाड़ी देश से आते थे। यह शोध आलेख इस तथ्य को विश्लेषित करता है कि युद्ध का सामाजिक प्रभाव केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP), तेल मूल्य अथवा व्यापार घाटे से नहीं मापा जा सकता। इसका मूल्यांकन मानव पूंजी, सामाजिक असमानता, शिक्षा के विपोषण, वित्तीय संकट की निरंतरता, कौशल विकास और शांतिस्थिरता तथा पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में भी किया जाना- आर्थिक पुनर्निर्माण रणनीति का एक प्रमुख घटक बनाया-प्रबंधन और दीर्घकालिक सामाजिक-आवश्यक है। अतः शिक्षा को संकट जाना चाहिए।
मुख्य शब्दः- अमेरिका-ईरान संघर्ष, युद्ध, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, भारत, दक्षिणपूर्व एशिया-, सामाजिक प्रभाव, आर्थिक प्रभाव, शिक्षा, मानव पूंजी, शांति शिक्षा, सतत विकास।