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  • सारांश:

    ज्ञानमीमांसा दर्शनशास्त्र की वह शाखा है जो ज्ञान के सिद्धांत से संबंधित है। यह ज्ञान की प्रकृति, औचित्य और विश्वास की तर्कसंगतता का अध्ययन करती है। सुकरात, प्लेटो से ले आधुनिक जगत के दार्शिनिकके लेखो, विचारो से भी कोईस्पष्ट दावा किया जा सकता है कि ज्ञान क्या है  जब प्रारंभिक सवाल का ही उत्तर हमारे पास नही है तो किस तरह हम उसके मार्ग कि कल्पना कर सकते है तथा ज्ञान कि संरचना के प्रति इतनी असहमति है कि ज्ञान के विभिन्न प्रकार क्या हैं, जिसकी कोई सर्वमान्य “मास्टर सूची” मौजूद ही नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्ञान विशुद्ध रूप से दर्शनशास्त्र कि प्रकृति का है; बहस सदियों से चली आ रही है, तर्क, तथ्यों को पीछे छोड़ देते हैं, और हर किसी की इस बारे में अलग-अलग राय होती है कि ज्ञान क्या है या क्या नहीं है। इस आलेख में हम ज्ञान के जी० टी० बी० सिद्धांत के साथ-साथ विशुद्ध दार्शनिक विमर्श पर चर्चा करंगे जो ज्ञान को मुख्य दो आधारोंतर्कवाद/ बुद्धिवाद और अनुभववाद में बाटता है।

    संकेत शब्द- ज्ञानमीमांसा, जी०टी०बी० सिधान्त, तर्कवाद, अनुभववाद 

    Author: *तौसीफ मलिक **पंकज कुमार गुप्ता
  • सारांश

    इक्कीसवीं सदी में कोई एक भूदेश या गुट में सैद्धांतिक संघर्ष नहीं रह गया है-, बल्कि उसका प्रभाव अन्य देश में विभिन्न क्षेत्र जैसे ऊर्जा, व्यापार, वित्त, खाद्य सुरक्षा, रोजगार, आवास, सामाजिक स्थिरता, शांति आदि तक व्यापक रूप से फैलता और दिखता है। 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए इजरायल, अमेरिकाईरान युद्ध और इसके परिणामस्वरूप लाल सागर-, होर्मुज जलडमरूमध्य में उपनिबंधन ने इसपर परिवर्तनीय वैश्विक आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया। होर्मुज जलडमरूमध्य विशेष रूप से दक्षिणपूर्व एशिया की दिशा के- ऊर्जा या पार का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है और इसके उपनिबंधन ने तेल, गैस, उर्वरक तथा समुद्री परिवहन लागत को बहुत अधिक बढ़़ा दिया है। विश्व बैंक के अनुसार 2026 के इस संघर्ष के कारण वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर गंभीर दबाव पड़ा है तथा ऊर्जा कीमतों, मुद्रास्फीति और वित्तीय लागत में वृद्धि के कारण हालात खराब कर दिया हैं। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले विकासशील और ऊर्जा-आयात निर्भर देश के लिए इस संघर्ष का प्रभाव पेट्रोलियम, एलपीजी, प्राकृतिक गैस, परिवहन, विनिर्माण, कृषि और घरेलू उपयोग तक पहुंचता है। दूसरी ओर, दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देश भी मध्य पूर्व से तेल और गैस पर प्रायः निर्भर हैं। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी- IEA के अनुसार संकट से पहले दक्षिण पूर्व एशिया के लगभग-60 प्रतिशत कच्चे तेल आयात और लगभग एक तिहाई गैस का आयात खाड़ी देश से आते थे। यह शोध आलेख इस तथ्य को विश्लेषित करता है कि युद्ध का सामाजिक प्रभाव केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP), तेल मूल्य अथवा व्यापार घाटे से नहीं मापा जा सकता। इसका मूल्यांकन मानव पूंजी, सामाजिक असमानता, शिक्षा के विपोषण, वित्तीय संकट की निरंतरता, कौशल विकास और शांतिस्थिरता तथा पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में भी किया जाना- आर्थिक पुनर्निर्माण रणनीति का एक प्रमुख घटक बनाया-प्रबंधन और दीर्घकालिक सामाजिक-आवश्यक है। अतः शिक्षा को संकट जाना चाहिए।

    मुख्य शब्दः- अमेरिका-ईरान संघर्ष, युद्ध, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, भारत, दक्षिणपूर्व एशिया-, सामाजिक प्रभाव, आर्थिक प्रभाव, शिक्षा, मानव पूंजी, शांति शिक्षा, सतत विकास।

    Author: Dr. Shivesh Prasad Rai
  • सारांश-

    नई सदी का व्यक्ति आंतरिक संघर्ष और मानसिक तनाव से जूझ रहा है जिसे साहित्य में बखूबी दर्शाया गया है साहित्य में वृद्धो की उपेक्षा और उनके अकेलेपन को लेकर चिंता जनक की स्थिति का चित्रण और विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण के विकास को लेकर विनाश को लेकर साहित्य में चिंता और जागरूकता दिख रही है । पश्चिमी प्रभाव के कारण भौतिक सुख सुविधाओं की दौड़ बढी है, जिससे जीवन की सार्थकता का प्रश्न उठा है। संयुक्त परिवारों का टूटना, एकल परिवारों का उदय, साहित्य में महिलाओं को सशक्त और स्वतंत्र दिखाया जा रहा है, लेकिन साथ ही बदलते सामाजिक परिदृश्य में उनकी चुनौतियों को भी रेखांकित किया जा रहा है। प्रवासी भारतीयों द्वारा रचा जा रहा साहित्य और इंटरनेट सोशल मीडिया वह ब्लॉग के माध्यम से साहित्य का नया रूप सामने आया है। वैश्वीकरण और बाजारीकारण के कारण स्वार्थ परता बढी है, जिससे साहित्य में जीवन मूल्यों का ह्रास या प्रमुखता से हुआ है।

     

    शब्द संकेत - भारतीय साहित्य,  जीवन मूल्य , सांस्कृतिक चेतना,  मानवीय संवेदना , जीवन मूल्य

    Author: डाॕ सुनीता गुप्ता
  • सारांश:

    दुनिया के तमाम विकसित और विकासशीलदेश अपने- अपने स्तर पर देश प्रेम के साथ-साथ विश्व प्रेम के प्रति अपनी सजकता को जोर-शोर से दिखाते है। सरकारें मोहब्बत, हमदर्दी, प्यार, मानवता के साथ  देश की नीव रखती है, और दुसरे ही बरक्स वह इस प्रेम को किसी भौगोलिक परिधि में सीमित कर बाकी के प्रति नफ़रत और प्रतिद्वंदीजैसा बर्ताव कर वह हिडिन करिकुलम की तरह परोस देते है वह  साथ ही साथ देश और विश्व के प्रति अपने लोगो में एक कर्तव्य की भावना को विकसित करने के उद्देश से जी20, ग्लोबल वार्मिंग, आतंकवाद जैसी  अवधारण को वैश्विक पटल पर रखती हैं। वह यह दिखाने का प्रयत्न करती है, कि विश्व के सभी मानव एक समान है, लेकिन दुसरे ही पहर जाति, विचार में भिन्नता, रहने का तरीका, ईश्वर संबंधित मान्यताएं, खाने संबंधित विभिनताएं, नसल, रंग, वर्ग, के चलते  लोगो और लोगो का समूह किसी को खास भौगोलिक स्थान से दूसरे स्थान पर जबरन जाने के लिया मजबूर किए जाता है। तो सवाल लाज़मी हो जाता है, कि 12 दशकों से क्यों वह  सफेद चादर ओढ़े विश्व बंधुता का नारा दे रही जब नफरत ही उसकी पहचान है। इस शोध आलेख में शोधार्थी ने कुछ प्रश्नोंको उजागर करने का प्रयत्न किया है। जैसे विश्व बंधुता क्या है? मानव पलायन क्या है? क्यों विश्व बंधुता के नारे के साथ-साथ मानव पलायन बढ़ रहा है?

    शब्द संकेत:-विश्व बंधुता, समाज, मानव, मानव पलायन

    Author: *तौसीफ मलिक ** डॉ० मसूद अंसारी
  • .सारांश (Abstract):

    यह लेख महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया में शिक्षा को सबसे शक्तिशाली उपकरण के रूप में प्रस्तुत करता है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में, शिक्षा न केवल महिलाओं को साक्षर बनाती है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी विकसित करती है। यह लेख शिक्षा के माध्यम से महिलाओं की आर्थिक स्वावलंबन, स्वास्थ्य सुधार और राजनीतिक भागीदारी पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करता है। महिला सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम शिक्षा है। महिला शिक्षा से  सामाजिक परिवर्तन की गति में बदलाव आता है और  लैंगिक समानता, आर्थिक स्वतंत्रता, पितृसत्ता तथा मानवाधिकार की रक्षा होती है । शिक्षा महिलाओं को तर्कशील बनाती है। आज आधुनिक युग में महिला और पुरुष एक ही गाड़ी के दो पहिये के समान है । सामाजिक दृष्टि से शिक्षा के कई आयाम है ,उन सभी की विवेचना करना समीचीन प्रतीत होता है ।

    मूल शब्द (Keywords): शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक परिवर्तन, लैंगिक समानता, आर्थिक स्वतंत्रता, पितृसत्ता, मानवाधिकार।

    Author: • साधना सिंह
  • सारांश 
    भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था देश की आर्थिक और सामाजिक संरचना का आधार है, जो 58ः जनसंख्या को रोजगार और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 20ः योगदान देती है। यह अनुसंधान पत्र उत्तराखंड के ऋषिकेश, जिला हरिद्वार में कृषि नवाचारों-जैविक खेती, डिजिटल कृषि, ड्रोन तकनीक, और स्मार्ट सिंचाई प्रणालियों के प्रभाव, चुनौतियों, और संभावनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्राथमिक डेटा (100 किसानों के साक्षात्कार और प्रश्नावली) और द्वितीयक डेटा (सरकारी रिपोर्ट, शोध पत्र) के आधार पर, यह अध्ययन नवाचारों की स्वीकार्यता, उनके आर्थिक, सामाजिक, और पर्यावरणीय प्रभाव, और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को उजागर करता है। अध्ययन का उद्देश्य स्थानीय कृषि प्रणालियों में नवाचारों को लागू करने की बाधाओं और अवसरों को समझना और स्थायी विकास के लिए ठोस सुझाव देना है।

    Key Word- . आर्थिक संरचना , सामाजिक संरचना, कृषि नवाचार, नीतिगत सुधार,  स्थानीय कृषि प्रणाली

    Author: Dr. Sallan Ali
  • सारांश 
    अल्जाइमर्स डिमेंशिया (Alzheimer's disease)  एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग है, जो मुख्यतः वृद्ध व्यक्तियों को प्रभावित करता है। इस रोग में मस्तिष्क की कोशिकाएँ धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं, जिससे स्मृति, सोचने-समझने की क्षमता तथा व्यवहार में निरंतर गिरावट आती है। प्रारंभिक अवस्था में व्यक्ति हाल की घटनाओं को भूलने लगता है, सामान्य शब्दों को याद रखने में कठिनाई अनुभव करता है तथा निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
    जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, व्यक्ति अपने परिचित लोगों को पहचानने में भी असमर्थ हो सकता है और दैनिक जीवन के सामान्य कार्यों को करने में कठिनाई महसूस करता है। इस रोग का प्रमुख कारण मस्तिष्क में बीटा-अमाइलॉइड प्लाक और टाऊ प्रोटीन का असामान्य संचय माना जाता है, जो न्यूरॉन्स के बीच संचार को बाधित करता है। इसके अतिरिक्त बढ़ती आयु, आनुवंशिक प्रवृत्ति, असंतुलित जीवनशैली तथा पर्यावरणीय कारक भी इसके जोखिम को बढ़ाते हैं।
    वर्तमान समय में इस रोग का पूर्ण उपचार उपलब्ध नहीं है, परंतु कुछ औषधियाँ और उपचार पद्धतियाँ इसके लक्षणों को नियंत्रित करने और प्रगति को धीमा करने में सहायक सिद्ध होती हैं। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक व्यायाम, मानसिक सक्रियता तथा सामाजिक सहभागिता इस रोग की रोकथाम और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    मुख्य शब्द 
    अल्जाइमर्स, डिमेंशिया, स्मृति ह्रास, न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग, मस्तिष्क कोशिकाएँ, बीटा-अमाइलॉइड।

    Author: डॉ0 सूफ़िया
  • शोध सार (Abstract)

    21वीं सदी में महिला सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और सतत विकास (Sustainable Development) की अनिवार्य शर्त बन चुका है। किसी भी समाज की प्रगति का मूल्यांकन इस बात से होता है कि उसमें महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता, समता और अवसर प्राप्त हैं। प्रस्तुत शोध आलेख भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तिकरण के बहुआयामी पहलुओं- सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और कानूनी-का गहनविश्लेषण करता है। यह अध्ययन वर्तमान समय में उपलब्ध अवसरों, जैसे कि शिक्षा का विस्तार, डिजिटल क्रांति, महिला उद्यमिता तथा संवैधानिक संरक्षण का मूल्यांकन करता है। साथ ही, यह शोधपितृसत्तात्मक संरचना, लिंग-आधारित हिंसा, आर्थिक विषमता और डिजिटल विभाजन जैसी उन गंभीर चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है जो महिलाओं के सर्वांगीण विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं। अंत में, यह आलेखनीतिगत सुधारों, सामाजिक जागरूकता और व्यावहारिक उपायों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक भावी रोडमैप प्रस्तुत करता है।

    मुख्यशब्द (Keywords): महिलासशक्तिकरण, लैंगिकसमता, पितृसत्तात्मक ढाँचा, सततविकास, आर्थिकआत्मनिर्भरता, कानूनीअधिकार, डिजिटलसाक्षरता।

    Author: Sadhana Singh
  • सारांश

    रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। युद्ध के कारण मानवीय संकट, विस्थापन, बुनियादी ढाँचे का विनाश, मुद्रास्फीति और आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान बढ़े हैं। भारत के लिए यह संघर्ष विशेष रूप से जटिल है क्योंकि उसके रूस के साथ लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं, जबकि वह अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के साथ भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है। भारत ने रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी रक्षा-आयात निर्भरता कम करने और अमेरिका,  फ्रांस, इजराइल, जापान आदि के साथ सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया है। 

       ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने रूसी तेल को अल्पकालिक विकल्प के रूप में अपनाया, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से आयात स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता महसूस की। ब्राजील, कोलंबिया, कनाडा आदि से तेल प्राप्त करने तथा घरेलू गैस खोज को बढ़ाने के प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा हैं। युद्ध ने भारत के यूरोपीय संबंधों को भी नए अवसर दिए हैं। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी, डिजिटल क्षेत्र, हरित ऊर्जा और लचीली आपूर्ति-श्रृंखला में सहयोग बढ़ा है। फ्रांस और जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों के साथ भारत के राजनीतिक एवं रक्षा संबंध भी मजबूत हुए हैं।

            भारत को रूस-चीन की बढ़ती निकटता तथा चीन और पाकिस्तान से जुड़े अपने सुरक्षा हितों के कारण सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा। साथ ही, यूक्रेन के पुनर्निर्माण में भारत एक विश्वसनीय भागीदार की भूमिका निभा सकता है और बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग बढ़ा सकता है। 

    निष्कर्षतः- रूस-यूक्रेन युद्ध ने भारत के सामने चुनौती के साथ-साथ रणनीतिक अवसर भी पैदा किए हैं। भारत की विदेश नीति मुख्यतः राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा-विविधीकरण और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण अपनाती दिखाई देती है।

    मुख्य शब्दः- विदेश नीति, राष्ट्रहित, रक्षा, उर्जा, सुरक्षा, विविधीकरण, संतुलन और समाधान

    Author: Dr. shivesh Prasad Rai,
  • सार(ABSTRACT)
    आधुनिक भारतीय शिक्षादर्शन में स्वामीविवेकानंद और रवींद्रनाथटैगोर का योगदानअत्यंत मौलिक एवंदूरगामी है। औपनिवेशिकब्रिटिश शासन द्वारालागू की गईमैकालेवादी शिक्षा प्रणालीने भारतीय युवाओंको अपनी सांस्कृतिकजड़ों से काटकरकेवल प्रशासनिक आवश्यकताओंकी पूर्ति कासाधन बना दियाथा। इसके विरोधमें स्वामी विवेकानंदऔर रवींद्रनाथ टैगोरने मानव-केंद्रित, सर्वांगीण और स्वावलंबीशिक्षा का सिद्धांतप्रतिपादित किया। जहाँस्वामी विवेकानंद ने 'चरित्र-निर्माण' और 'मनुष्य-मेकिंग' (Man-making Education) को शिक्षा कामूल आधार माना, वहीं रवींद्रनाथ टैगोरने 'प्रकृति', 'स्वतंत्रता' और 'सृजनात्मकता' (Naturalism and Creativity)के समन्वय पर बल दिया ।                           

    प्रस्तुत शोध-पत्रका मुख्य उद्देश्यस्वामी विवेकानंद औररवींद्रनाथ टैगोर कीशैक्षणिक विचारधाराओं कासमीक्षात्मक एवं तुलनात्मकअध्ययन प्रस्तुत करनाहै। इस अध्ययनमें दोनों विचारकोंके दर्शन, शिक्षणपद्धतियों तथा पाठ्यक्रमका विश्लेषण कियागया है। यहशोध गुणात्मक (Qualitative) अनुसंधानदृष्टिकोण और विश्लेषणात्मकपद्धति पर आधारितहै। अध्ययन कानिष्कर्ष यह स्पष्टकरता है किविवेकानंद और टैगोरके विचार चरित्र, पर्यावरण, और वैश्विकचेतना के निर्माणके लिए अत्यंतप्रासंगिक हैं।

    मुख्य शब्द (Keywords): स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, शैक्षणिक विचारधारा, चरित्र-निर्माण, प्रकृतिवाद, वेदांत दर्शन, शांतिनिकेतन ।

    Author: Pankaj Kumar Singh