सारांश:
दुनिया के तमाम विकसित और विकासशीलदेश अपने- अपने स्तर पर देश प्रेम के साथ-साथ विश्व प्रेम के प्रति अपनी सजकता को जोर-शोर से दिखाते है। सरकारें मोहब्बत, हमदर्दी, प्यार, मानवता के साथ देश की नीव रखती है, और दुसरे ही बरक्स वह इस प्रेम को किसी भौगोलिक परिधि में सीमित कर बाकी के प्रति नफ़रत और प्रतिद्वंदीजैसा बर्ताव कर वह हिडिन करिकुलम की तरह परोस देते है वह साथ ही साथ देश और विश्व के प्रति अपने लोगो में एक कर्तव्य की भावना को विकसित करने के उद्देश से जी20, ग्लोबल वार्मिंग, आतंकवाद जैसी अवधारण को वैश्विक पटल पर रखती हैं। वह यह दिखाने का प्रयत्न करती है, कि विश्व के सभी मानव एक समान है, लेकिन दुसरे ही पहर जाति, विचार में भिन्नता, रहने का तरीका, ईश्वर संबंधित मान्यताएं, खाने संबंधित विभिनताएं, नसल, रंग, वर्ग, के चलते लोगो और लोगो का समूह किसी को खास भौगोलिक स्थान से दूसरे स्थान पर जबरन जाने के लिया मजबूर किए जाता है। तो सवाल लाज़मी हो जाता है, कि 12 दशकों से क्यों वह सफेद चादर ओढ़े विश्व बंधुता का नारा दे रही जब नफरत ही उसकी पहचान है। इस शोध आलेख में शोधार्थी ने कुछ प्रश्नोंको उजागर करने का प्रयत्न किया है। जैसे विश्व बंधुता क्या है? मानव पलायन क्या है? क्यों विश्व बंधुता के नारे के साथ-साथ मानव पलायन बढ़ रहा है?
शब्द संकेत:-विश्व बंधुता, समाज, मानव, मानव पलायन