Vol:1 Issue: 2 April-June,2026
सारांश
रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। युद्ध के कारण मानवीय संकट, विस्थापन, बुनियादी ढाँचे का विनाश, मुद्रास्फीति और आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान बढ़े हैं। भारत के लिए यह संघर्ष विशेष रूप से जटिल है क्योंकि उसके रूस के साथ लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं, जबकि वह अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के साथ भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है। भारत ने रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी रक्षा-आयात निर्भरता कम करने और अमेरिका, फ्रांस, इजराइल, जापान आदि के साथ सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया है।
ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने रूसी तेल को अल्पकालिक विकल्प के रूप में अपनाया, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से आयात स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता महसूस की। ब्राजील, कोलंबिया, कनाडा आदि से तेल प्राप्त करने तथा घरेलू गैस खोज को बढ़ाने के प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा हैं। युद्ध ने भारत के यूरोपीय संबंधों को भी नए अवसर दिए हैं। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी, डिजिटल क्षेत्र, हरित ऊर्जा और लचीली आपूर्ति-श्रृंखला में सहयोग बढ़ा है। फ्रांस और जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों के साथ भारत के राजनीतिक एवं रक्षा संबंध भी मजबूत हुए हैं।
भारत को रूस-चीन की बढ़ती निकटता तथा चीन और पाकिस्तान से जुड़े अपने सुरक्षा हितों के कारण सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा। साथ ही, यूक्रेन के पुनर्निर्माण में भारत एक विश्वसनीय भागीदार की भूमिका निभा सकता है और बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से सहयोग बढ़ा सकता है।
निष्कर्षतः- रूस-यूक्रेन युद्ध ने भारत के सामने चुनौती के साथ-साथ रणनीतिक अवसर भी पैदा किए हैं। भारत की विदेश नीति मुख्यतः राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा-विविधीकरण और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण अपनाती दिखाई देती है।
मुख्य शब्दः- विदेश नीति, राष्ट्रहित, रक्षा, उर्जा, सुरक्षा, विविधीकरण, संतुलन और समाधान